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बेज़ुबान, बेवजह सा वो एहसास था,
यौवनावस्था का वो आगाज़ था।
उसके शरीर के हर अंग का
बस यही उससे प्रश्न था,
कि आखिर क्या दोष था उसका
जो यह दर्द उसी के हिस्से आया था,
बेखबर थी उस समय वह
कि कुदरत ने उसे किस सौभाग्य से सजाया था।
कर दी गई थी वह हर तरह से लाचार,
जब मां ने कहा न छूना अब तुम आचार।
जिस मां से मिला उसे बेटी होने का नूर,
उसी मां ने किया उसे मंदिर मस्जिद से दूर।
जिस रक्त कण से मानवता का निर्माण हुआ
उसी जात की बुद्धि में अभाव हुआ।
जिस कोख से जन्म लिया तुमने
उसी मां को क्यों सात दिन तक नकारा तुमने?
यह दर्द, यह तकलीफ सहन कर सको, तो कहना
अपनी उपेक्षाओं से ऊपर उठ कर सम्मान कर सको, तो कहना
यूं ही नहीं मिला वंश आगे बढ़ाने का वरदान हमें,
चुप-चुप रह कर भी, सब कुछ सहकर भी मुस्करा सको, तो कहना।
जिस दर्द का घूंट वह हर महीने पीकर रह जती है,
एक बुरी नज़र उसका मन विचलित कर जाती है।
उसके कपड़ों पर लगे जिस लाल रंग से तुम्हें शर्म आती है,
इसी कारण तुम्हारे आंगन में लाल की किलकारी आती है।




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